Monday, June 07, 2010

कुछ पंक्तियाँ

जो तुम्हारी अहमियत राहे-ज़िन्दगी में महसूस होती
इजहारे दिल करने की गुस्ताखी ना की होती

गुरूर तुम्हें हो ना कहीं अपने ही होने का
गुज़री शामें जों, वो तुम्हारी जुस्तजू नहीं
मेरे दिल की लगी थीं...

****

मैं अपनी दो बादामी आखों में समां रही हूँ तूफ़ान
और यह विशाल अम्बर कुछ बूँदें ना रोक पाया


3 comments:

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

hi...
saw your composition just now...
you are a great writer...
i also write in HINDI
please do visit my blog too...

http://shayarichawla.blogspot.com/

cheers!
Surender Chawla.

सुरेन्द्र "मुल्हिद" said...

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cheers!
Surender Chawla.

Punit Biyani said...

well said................ rocking